खुर्सीपार पंचायत के सरकारी रिकॉर्ड ने खोली पोल..

लाखों का व्यय दर्ज, मूल्यांकन ₹0 — वर्षों पुराने काम ...

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लाखों का व्यय दर्ज, मूल्यांकन ₹0 — वर्षों पुराने काम अब भी अधूरे/रुके दर्ज, निगरानी तंत्र पर सीधे सवाल..

सिवनी/लखनादौन। ग्राम पंचायत खुर्सीपार के विकास कार्यों का सरकारी ऑनलाइन रिकॉर्ड अब पंचायत से ज्यादा निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है। पोर्टल पर कहीं राशि खर्च दर्ज है, लेकिन मूल्यांकन राशि ₹0 है। कहीं वर्षों पुराने कार्य आज भी रुके हुए दर्ज हैं। कहीं सीसी जारी दिखाई दे रहा है, लेकिन व्यय शून्य है।

अब सवाल सीधा है—सरकारी पैसा खर्च हुआ तो मूल्यांकन कहां है? काम हुआ तो उसका भौतिक सत्यापन कहां है? और वर्षों पुराने काम आज भी उसी स्थिति में क्यों पड़े हैं?

*व्यय दर्ज, मूल्यांकन शून्य—यह हिसाब कैसे?*

सारसडोल के सामुदायिक शौचालय से जुड़े रिकॉर्ड में ₹2.10 लाख की स्वीकृति तथा एक प्रविष्टि में ₹1,81,989 का व्यय दर्ज है। लेकिन मूल्यांकन राशि ₹0 दिखाई दे रही है।

*सरकारी रिकॉर्ड में खर्च दर्ज है, मगर मूल्यांकन शून्य।*

सवाल यह है—माप पुस्तिका किसने बनाई? किसने माप प्रमाणित किया? स्थल निरीक्षण किसने किया? गुणवत्ता की जांच किसने की? पूर्णता प्रमाण-पत्र किस आधार पर जारी हुआ?

*रिकॉर्ड इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं देता।*

कुएं की मरम्मत में पैसा खर्च, काम अब भी जारी

वर्ष 2024 के पुराने पेयजल कूपों की मरम्मत से जुड़े कार्यों में भी रिकॉर्ड सवाल खड़े करता है।

दो कार्यों के लिए कुल ₹98,000 की स्वीकृति दर्ज है। सारसडोल में ₹45,987 तथा खुर्सीपार में ₹48,154 व्यय दर्ज है। इसके बावजूद दोनों कार्य चल रहे दर्ज हैं और मूल्यांकन राशि ₹0 दिखाई दे रही है।

*पैसा खर्च हुआ तो काम पूरा क्यों नहीं?*

काम पूरा नहीं हुआ तो भुगतान किस आधार पर हुआ?

मूल्यांकन नहीं हुआ तो व्यय दर्ज कैसे हुआ?

इन सवालों का जवाब अब पंचायत से नहीं, संबंधित तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारियों के रिकॉर्ड से मांगा जाना चाहिए।

*2016 के नलजल कार्य आज भी ‘रुके’—जवाबदेही किसकी?*

वर्ष 2016-17 के नलजल संबंधी कार्यों में भी रिकॉर्ड सामान्य नहीं दिखता।

– ₹1.65 लाख स्वीकृत — ₹40,820 व्यय — स्थिति: रुका हुआ

– ₹75 हजार स्वीकृत — ₹19,500 व्यय — स्थिति: रुका हुआ

– कूप अतिरिक्त खनन — ₹15 हजार स्वीकृत — व्यय ₹0 — स्थिति: रुका हुआ

*छह-सात वर्ष नहीं, बल्कि करीब एक दशक का समय बीत चुका है।*

फिर भी सरकारी पोर्टल पर काम रुका हुआ दर्ज है।

काम रुका तो जिम्मेदार कौन?

व्यय हुआ तो किस काम पर हुआ?

काम पूरा हुआ तो पोर्टल अपडेट क्यों नहीं?

काम अधूरा रहा तो भुगतान की स्थिति क्या है?

यह केवल पंचायत का नहीं, बल्कि तकनीकी स्वीकृति, निरीक्षण, माप, मूल्यांकन और भुगतान प्रक्रिया की निगरानी का भी सवाल है।

*2013 के काम—सीसी जारी, व्यय शून्य!*

वर्ष 2013-14 के तीन कार्य रिकॉर्ड में दर्ज हैं—

– शांतिधाम रोड — ₹1.50 लाख

– अनाज गोदाम — ₹5 लाख

– हाट बाजार शेड — ₹1.50 लाख

तीनों में पोर्टल पर व्यय ₹0 और स्थिति ‘सीसी जारी किया गया’ दिखाई देती है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल निकलता है—

सीसी जारी हुआ तो खर्च शून्य कैसे?

कार्य बना तो भुगतान कहां है?

भुगतान नहीं हुआ तो सीसी किस आधार पर जारी हुआ?

और यदि रिकॉर्ड में कोई तकनीकी या पोर्टल संबंधी त्रुटि है, तो इतने वर्षों में उसे सुधारा क्यों नहीं गया?

2010 की बाउंड्रीवॉल—16 साल बाद भी रिकॉर्ड सवालों में

प्राथमिक शाला सारसडोल की बाउंड्रीवॉल के लिए वर्ष 2010-11 में ₹3,62,150 की स्वीकृति दर्ज है।

पोर्टल पर व्यय ₹0 और स्थिति ‘सीसी जारी किया गया’ दिखाई देती है।

यानी मामला करीब 16 वर्ष पुराने रिकॉर्ड तक पहुंच गया है।

अब फाइल खोलना जरूरी है।

स्वीकृति किसने दी?

काम किसने कराया?

माप किसने किया?

सीसी किस अधिकारी ने जारी किया?

भुगतान हुआ या नहीं?

मौके पर बाउंड्रीवॉल आज मौजूद है या नहीं?

इन सवालों का जवाब केवल पोर्टल से नहीं, मूल शासकीय अभिलेख और मौके के भौतिक सत्यापन से मिलेगा।

एक ही प्रकार के कार्यों की प्रविष्टियां भी जांच के दायरे में

वर्ष 2023-24 में सारसडोल के लीच पिट निर्माण से संबंधित अलग-अलग प्रविष्टियां दिखाई देती हैं। दो प्रविष्टियों में ₹18,990-₹18,990 व्यय दर्ज है, जबकि मूल्यांकन राशि ₹0 दिखाई देती है।

यह अलग-अलग कार्य हैं या रिकॉर्ड में दोहराव—यह विभागीय जांच का विषय है।

यदि कार्य अलग हैं तो दोनों के स्थल, स्वीकृति, माप और भुगतान अलग-अलग दिखने चाहिए।

यदि एक ही कार्य है तो दो प्रविष्टियों का आधार स्पष्ट होना चाहिए।

रिकॉर्ड की पारदर्शिता यहीं से साबित होगी।

*अब पंचायत नहीं, पूरी निगरानी व्यवस्था से सवाल*

खुर्सीपार पंचायत के रिकॉर्ड में दिखाई दे रही इन प्रविष्टियों पर केवल पंचायत स्तर की खानापूर्ति जांच पर्याप्त नहीं होगी।

*जनपद पंचायत लखनादौन को कार्यवार जांच कर यह देखना चाहिए—*

स्वीकृति → तकनीकी स्वीकृति → प्रशासकीय स्वीकृति → माप पुस्तिका → स्थल निरीक्षण → मूल्यांकन → भुगतान → पूर्णता प्रमाण-पत्र → वर्तमान भौतिक स्थिति।

*हर कड़ी का मिलान होना चाहिए।**

अधिकारियों से सीधे सवाल

व्यय दर्ज है तो मूल्यांकन ₹0 क्यों?

मूल्यांकन ₹0 है तो भुगतान किस आधार पर हुआ?

2016 के कार्य आज भी रुके क्यों दर्ज हैं?

2013 के कार्यों में सीसी जारी और व्यय ₹0 एक साथ कैसे?

2010 की बाउंड्रीवॉल का भौतिक सत्यापन कब हुआ?

जिन कार्यों पर राशि खर्च हुई, उनकी एमबी किसने प्रमाणित की?

किस अधिकारी ने भुगतान से पहले कार्य की गुणवत्ता और मात्रा जांची?

मूल्यांकन दर्ज नहीं होने के बावजूद भुगतान हुआ तो उसका दस्तावेजी आधार क्या है?

क्या प्रत्येक कार्य का स्थल निरीक्षण हुआ?

यदि हुआ तो निरीक्षण रिपोर्ट कहां है?

अब कागजी जांच नहीं—मौके पर जांच चाहिए

सरकारी पोर्टल पर दर्ज आंकड़े अपने आप में अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। लेकिन जब व्यय, मूल्यांकन, कार्य की स्थिति और सीसी में विरोधाभासी प्रविष्टियां दिखाई देती हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब जरूरत ऐसी जांच की है जिसमें सिर्फ कागजों पर रिपोर्ट बनाकर फाइल बंद न हो।

हर कार्य का स्थल देखा जाए।

हर भुगतान का आधार निकाला जाए।

हर एमबी की जांच हो।

हर सीसी का सत्यापन हो।

हर मूल्यांकन की स्थिति स्पष्ट हो।

खुर्सीपार पंचायत के वर्षों पुराने विकास कार्यों का हिसाब अब साफ होना चाहिए—

किसने स्वीकृत किया?
किसने काम कराया?
किसने मापा?
किसने मूल्यांकन किया?
किसे भुगतान हुआ?
और मौके पर वास्तव में क्या बना?

सरकारी रिकॉर्ड में सवाल खड़े हैं। अब जवाब भी सरकारी रिकॉर्ड में चाहिए।

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