नया सिस्टम… पड़ताल लखनादौन में अवैध प्लाटिंग का खेल जारी, खबरों के बाद भी कार्रवाई पर सवाल, सेलुआ के पटवारी हल्का नंबर 82 में 12 प्लॉट गायब होने का आरोप..

राजस्व, नगर परिषद, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और वन विभाग ...

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राजस्व, नगर परिषद, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और वन विभाग से जवाब मांगे प्रशासन, रजिस्ट्री है तो जमीन कहां? जमीन है तो प्लॉट मौके से गायब कैसे?

सिवनी। लखनादौन तहसील में अवैध प्लाटिंग और कॉलोनी निर्माण का मुद्दा नया नहीं है। इस मामले में लगातार खबरें प्रकाशित हो रही हैं। शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद यदि प्लाटिंग का सिलसिला जारी है तो सबसे बड़ा सवाल शासन की निगरानी व्यवस्था पर ही खड़ा होता है। अब पटवारी हल्का नंबर 82, सेलुआ से जुड़ा मामला सामने आया है। करीब 12 प्लॉट खरीदारों द्वारा अपने प्लॉट मौके पर नहीं मिलने का आरोप लगाया गया है। खरीदारों का कहना है कि रजिस्ट्री होने के बावजूद मौके पर प्लॉट की स्थिति स्पष्ट नहीं है।

*12 प्लॉट गायब कैसे हुए?*

यह सामान्य सवाल नहीं है, रजिस्ट्री किस भूमि की हुई? खसरा कौन-सा है? रकबा कितना है? नक्शे में प्लॉट कहां है? मौके पर सीमा कहां है? नामांतरण किस आधार पर हुआ? और यदि प्लॉट मौके पर नहीं है तो रजिस्ट्री किस जमीन की हुई? इन सवालों का जवाब अब कागजों से नहीं, मौके के सीमांकन और मूल राजस्व रिकॉर्ड के मिलान से देना होगा।

*खबरें छपती रहीं, कार्रवाई कहां हुई?*

अवैध प्लाटिंग को लेकर समाचार प्रकाशित होते रहे। शिकायतें होती रहीं, प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में मामले पहुंचते रहे। इसके बाद भी यदि नई शिकायत सामने आती है तो यह सवाल सीधे संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर जाता है। क्या शिकायतों की जांच केवल कागजों तक सीमित रही? क्या मौके पर जाकर जांच हुई? क्या अवैध प्लाटिंग की जमीन चिन्हित की गई? क्या कॉलोनाइजरों की सूची तैयार हुई? क्या बिना अनुमति विकसित किए जा रहे लेआउट पर रोक लगी? यदि कार्रवाई हुई है तो उसका परिणाम भी सामने आना चाहिए।

*राजस्व विभाग से सीधा सवाल*

पटवारी हल्का नंबर 82 के रिकॉर्ड की जांच कब हुई? संबंधित खसरा नंबरों की मूल स्थिति, वर्तमान स्थिति, नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, नक्शा, रकबा और भूमि उपयोग की जांच आवश्यक है। यदि रिकॉर्ड में प्लॉट मौजूद हैं तो मौके पर क्यों नहीं दिखाई दे रहे? और यदि रिकॉर्ड में स्थिति अलग है तो रजिस्ट्री किस आधार पर हुई? राजस्व रिकॉर्ड की जिम्मेदारी किसकी है, यह भी प्रशासन को स्पष्ट करना होगा।

*लखनादौन तहसील प्रशासन की निगरानी पर सवाल*

तहसील क्षेत्र में भूमि संबंधी गतिविधियों की जानकारी राजस्व अमले के माध्यम से प्रशासन तक पहुंचती है। ऐसे में सवाल यह है कि संबंधित क्षेत्र में प्लाटिंग की गतिविधियां चल रही थीं तो समय रहते इसकी जानकारी प्रशासन तक पहुंची या नहीं, अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर जानकारी नहीं थी तो निगरानी तंत्र कहां था?

*लखनादौन नगर परिषद को भी देना होगा जवाब*

यदि संबंधित क्षेत्र नगर परिषद की सीमा अथवा उसके प्रभाव क्षेत्र से जुड़ा है तो कॉलोनी विकास, सड़क, लेआउट, भवन तथा अन्य अनुमतियों से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच आवश्यक है। क्या कोई स्वीकृत लेआउट था? क्या कॉलोनी विकास की अनुमति थी? क्या सड़क और सार्वजनिक उपयोग की भूमि निर्धारित थी? क्या बिना अनुमति प्लाट काटे गए? इन सवालों का रिकॉर्ड आधारित जवाब सामने आना चाहिए।

*टाउन एंड कंट्री प्लानिंग भी जांच के दायरे में*

कॉलोनी और प्लाटिंग से संबंधित स्वीकृतियां, लेआउट तथा भूमि उपयोग की स्थिति की जांच संबंधित नियोजन प्राधिकरण के रिकॉर्ड से की जानी चाहिए। यदि लेआउट स्वीकृत नहीं था और फिर भी प्लॉट काटकर बेचे गए तो यह केवल खरीदार की परेशानी नहीं, बल्कि संबंधित प्रक्रिया की गंभीर जांच का विषय है।

*वन विभाग पर उठी आशंका भी रिकॉर्ड से साफ हो*

खरीदारों द्वारा वन विभाग की भूमिका को लेकर भी आशंका व्यक्त की गई है, यह आरोप है या तथ्य—इसका निर्णय बयानबाजी से नहीं होगा, राजस्व नक्शा और वन रिकॉर्ड का मिलान कराया जाए। यदि भूमि वन सीमा से संबंधित नहीं है तो स्थिति स्पष्ट हो। यदि कोई विवाद या रिकॉर्ड संबंधी अंतर है तो उसकी रिपोर्ट सामने आए।

*लखनादौन पंजीयन विभाग भी सवालों से बाहर नहीं*

यदि 12 प्लॉटों की रजिस्ट्री हुई है तो संबंधित दस्तावेजों की जांच भी जरूरी है, रजिस्ट्री किस खसरा नंबर पर हुई? कितना रकबा दर्ज हुआ? विक्रेता कौन था? भूमि का स्वरूप क्या था? डायवर्जन की स्थिति क्या थी? रजिस्ट्री के समय प्रस्तुत दस्तावेज कौन-से थे? इन सवालों के जवाब सामने आने पर ही पूरा मामला साफ होगा।

*अब कलेक्टर सिवनी के सामने सीधा मामला*

मामला केवल 12 खरीदारों का नहीं रह गया है। मामला यह है कि एक ही क्षेत्र में बार-बार अवैध प्लाटिंग की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं और शिकायतों के बाद भी स्थिति नियंत्रित क्यों नहीं हो रही। जिला कलेक्टर सिवनी के स्तर से यदि संयुक्त राजस्व-नगरीय-नियोजन-वन जांच कराई जाती है तो मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। जांच केवल फाइलों से नहीं, मौके पर पहुंचकर, सीमांकन कराकर, मूल नक्शा देखकर, रजिस्ट्री से मिलान कराकर, राजस्व रिकॉर्ड मिलाकर, वन रिकॉर्ड मिलाकर, लेआउट की स्वीकृति देखकर की जानी चाहिए।

*प्रशासन के सामने पांच सीधे सवाल*

12 खरीदारों के कथित गायब प्लॉट वास्तव में किस खसरा नंबर पर हैं? रजिस्ट्री, राजस्व रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में कितना अंतर है? संबंधित क्षेत्र में प्लाटिंग की अनुमति और स्वीकृत लेआउट था या नहीं? पूर्व में अवैध प्लाटिंग की शिकायतों पर किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की? यदि अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदारी किस अधिकारी और किस कॉलोनाइजर की तय होगी?

*अब मामला दबाने का नहीं, रिकॉर्ड खोलने का है*

12 प्लॉटों का आरोप जांच का विषय है। अवैध प्लाटिंग की शिकायतें प्रशासन के लिए चेतावनी हैं, और बार-बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है, अब देखना यह है कि जिला प्रशासन केवल जांच के आदेश तक सीमित रहता है या मौके पर जांच कर पूरी तस्वीर जनता के सामने रखता है। सीधा सवाल प्लॉट गायब हैं तो जमीन कहां है? जमीन मौजूद है तो प्लॉट कहां हैं? और यदि दोनों मौजूद हैं तो खरीदारों को अपनी जमीन क्यों नहीं मिल रही?

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