खेत बिके, कॉलोनियां उगीं, शिकायतें दबीं, अधिकारी चुप, सिस्टम फेल, अब सवाल सीधे सत्ता तक..
सिवनी- अवैध प्लाटिंग पर मोहन सरकार की नीति क्या कहती है, जमीनी हकीकत क्यों उलट है? मध्यप्रदेश में अवैध प्लाटिंग और अनियमित कॉलोनियों को लेकर सरकार का रुख कागजों में बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ने कई मंचों पर कानून के राज और भू-माफियाओं पर कार्रवाई की बात कही है। लेकिन सवाल यह है, नीति और ज़मीन के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? सरकार की घोषित नीति (कागजों में सख्ती) सरकार के नियमों और अधिनियमों के अनुसार, बिना डायवर्सन (भूमि उपयोग परिवर्तन) कृषि भूमि पर प्लाटिंग अवैध है, बिना टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की अनुमति कॉलोनी बनाना दंडनीय अपराध है, अवैध कॉलोनियों पर तोड़फोड़ (बुलडोजर) कार्रवाई का प्रावधान है, संबंधित कॉलोनाइजर और जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर और दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, सरकार का स्पष्ट संदेश रहा है कि भू-माफिया बख्शे नहीं जाएंगे। जमीनी हकीकत (लखनादौन जैसे क्षेत्रों में) खेतों को टुकड़ों में काटकर खुलेआम बेचा जा रहा बिना अनुमति कॉलोनियां बस रही रजिस्ट्री भी उसी जमीन की हो रही शिकायतें दबाई जा रही जिम्मेदार विभाग मौन हैं यानी नीति कुछ और, अमल कुछ और। सरकार और सिस्टम, या तो सरकार के आदेश नीचे तक पहुंच ही नहीं रहे या फिर स्थानीय प्रशासन जानबूझकर उन्हें लागू नहीं कर रहा दोनों ही स्थितियां गंभीर हैं, सरकार के लिए असहज सवाल अगर नीति सख्त है, तो कार्रवाई क्यों नहीं? क्या स्थानीय अधिकारियों पर नियंत्रण खत्म हो गया है? क्या भू-माफिया प्रशासन से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं? क्या सरकार की छवि सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रह गई है? अगर सरकार सच में अवैध प्लाटिंग के खिलाफ है, तो लखनादौन जैसे मामलों में तुरंत विशेष जांच हो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो अवैध कॉलोनियों पर दृश्य कार्रवाई हो और सबसे जरूरी, रजिस्ट्री और राजस्व की मिलीभगत पर प्रहार हो मोहन सरकार की नीति कड़ी है, लेकिन जमीनी अमल ढीला नहीं, ढह चुका दिखता है। अगर यही स्थिति रही, तो भू-माफिया पर कार्रवाई का दावा जमीनी हकीकत के सामने खोखला साबित होगा।
कल को यही लोग कोर्ट-कचहरी में भटकेंगे जिम्मेदारी कौन लेगा?
लखनादौन में जो चल रहा है, वह सिर्फ अवैध प्लाटिंग नहीं यह प्रशासनिक तंत्र की सामूहिक विफलता और संदिग्ध मौन का ज्वलंत उदाहरण है। कृषि भूमि को काटकर बेचना, बिना अनुमति कॉलोनियां बसाना, और फिर उन्हीं प्लॉट्स की रजिस्ट्री कर देना, यह सब किसी एक विभाग की चूक नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की मिलीभगत का संकेत देता है। यहां राजस्व विभाग, नगर परिषद, उप पंजीयक कार्यालय और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सभी की चुप्पी एक बड़े मौन गठजोड़ की कहानी कह रही है।
राजस्व विभाग आंखें मूंदकर बैठा पहरेदार..
तहसील और एसडीएम कार्यालय का काम है कृषि भूमि के दुरुपयोग को रोकना। लेकिन लखनादौन में खेतों को टुकड़ों में काटकर बेचा जा रहा है और राजस्व अमला सिर्फ कागजों में सीमित है। क्या मौके पर निरीक्षण बंद हो चुके हैं? क्या अवैध डायवर्सन को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है?
लखनादौन नगर परिषद कॉलोनियों पर सहमति की चुप्पी..
नगर परिषद की जिम्मेदारी है कि बिना अनुमति कोई कॉलोनी विकसित न हो, लेकिन यहां सड़कों, नालियों और प्लॉटिंग का काम खुलेआम हो रहा है। और चौंकाने वाली बात शिकायतें कचरा गाड़ियों में अगर यह सच है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि शिकायत व्यवस्था का खुला अपमान है।
उप पंजीयक कार्यालय नियमों की खुली धज्जियां..
सबसे गंभीर सवाल उप पंजीयक कार्यालय पर है। बिना वैध डायवर्सन और स्वीकृति के जमीन की रजिस्ट्री कैसे हो रही है? क्या दस्तावेजों की जांच सिर्फ औपचारिकता रह गई है? क्या राजस्व अवैध, रजिस्ट्री वैध का नया मॉडल लागू हो गया है? अगर कॉलोनी अवैध है, तो रजिस्ट्री भी अवैध मानी जानी चाहिए फिर यह खेल किसके संरक्षण में चल रहा है?
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग कागजों में कैद विभाग..
जिस विभाग की अनुमति के बिना कॉलोनी बन ही नहीं सकती, वही विभाग इस पूरे घटनाक्रम में गायब है। न अनुमति, न रोक, न कार्रवाई क्या विभाग सिर्फ नाम का रह गया है?
सामूहिक मौन या संगठित संरक्षण?..
जब हर विभाग चुप हो, हर स्तर पर कार्रवाई शून्य हो, और अवैध कारोबार लगातार बढ़ता जाए तो यह महज संयोग नहीं माना जा सकता। यह मौन अब संदेह पैदा करता है क्या यह मौन सहमति है? यह पूरा मामला अब सिर्फ स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहा। यह सीधे डॉ. मोहन यादव सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। क्या सरकार को जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है? या फिर जानकर भी अनदेखी की जा रही है? क्या कानून का राज सिर्फ घोषणाओं तक सीमित है? अगर छोटे कस्बे में इस स्तर का अवैध कारोबार बिना रोक-टोक चल सकता है, तो यह शासन की विश्वसनीयता पर सीधा आघात है।
दलालों का नेटवर्क आम जनता फंस रही..
दलाल खुलेआम प्लॉट बेच रहे हैं। लोगों को सस्ते दाम में जमीन का लालच दिया जा रहा है, लेकिन न कानूनी सुरक्षा न बुनियादी सुविधाएं न भविष्य की गारंटी कल यही लोग कोर्ट-कचहरी में भटकेंगे जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब नहीं तो कब? मांग सख्त कार्रवाई की..
सभी अवैध कॉलोनियों की सूची सार्वजनिक हो, कॉलोनाइजरों पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो, अवैध निर्माण पर बुलडोजर कार्रवाई हो, उप पंजीयक कार्यालय की रजिस्ट्री की उच्च स्तरीय जांच हो, शिकायतों को दबाने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई हो, सभी विभागों की जवाबदेही तय कर निलंबन/दंड दिया जाए, लखनादौन में अवैध प्लाटिंग अब अपराध नहीं, प्रणाली बन चुकी है। और जब अपराध प्रणाली बन जाए, तो जिम्मेदार सिर्फ दलाल नहीं होते पूरी व्यवस्था कटघरे में होती है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह माना जाएगा कि यह खेल प्रशासन की जानकारी में और संरक्षण में चल रहा है।
प्रदेश भर में सभी कलेक्टरों को पूर्व में दिए जा चुके निर्देश..
प्रदेश में बड़ी संख्या पर विकसित हो रही अवैध कॉलोनी को लेकर मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव पूर्व में नाराज की जाता चुके हैं, मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद सभी कलेक्टरों को ऐसी कॉलोनियों पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे, उसके बाद सभी जिलों में अवैध रूप से विकसित हो रही कॉलोनी पर रोक लगा दी गई है, हालांकि सख्त कानून के अभाव में लखनादौन पर अभी भी अवैध कॉलोनी में प्लॉट का विक्रय हो रहा है।




