सिवनी- जिस भवन को जनप्रतिनिधियों ने विकास का प्रतीक बताकर जनता को समर्पित किया, वही भवन आज शासन की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है, जनपद पंचायत लखनादौन में 09 मार्च 2024 को बड़े तामझाम, नारियल-फीताकाट और फोटोसेशन के बीच जिस सभागार का लोकार्पण किया गया था, वही सभागार आज शासन के मुंह पर करारा तमाचा बन चुका है। लगभग 25 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से बने इस भवन की दीवारें अब खुलकर सच्चाई उगलने लगी हैं। लोकार्पण के कुछ ही महीनों बाद सभागार की दीवारों में लंबी-लंबी दरारें, प्लास्टर का उखड़ना और संरचना में कमजोरी साफ दिखाई दे रही है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा या अप्रत्याशित घटना का परिणाम नहीं, बल्कि निर्माण में की गई खुली लापरवाही, घटिया सामग्री और कागजी निरीक्षण व्यवस्था का सीधा प्रमाण है।
25 लाख खर्च, गुणवत्ता शून्य..
शासन के नियमों के अनुसार 25 लाख रुपये की लागत से बने किसी भी शासकीय भवन की न्यूनतम आयु दशकों में मापी जाती है, न कि महीनों में लेकिन लखनादौन का यह सभागार लोकार्पण के तुरंत बाद ही दरकने लगा, जिससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निर्माण में घटिया सीमेंट और अमानक सामग्री का उपयोग किया गया? क्या आरसीसी कार्य में मानकों की खुलेआम अनदेखी हुई? क्या माप पुस्तिका (एमबी) केवल टेबल-कुर्सी पर बैठकर भरी गई? यदि निर्माण गुणवत्ता सही होती, तो यह सभागार आज दरारों का नक्शा न बना होता। तकनीकी स्वीकृति और निरीक्षण सिर्फ काग़ज़ों में? शासकीय निर्माण प्रक्रिया स्पष्ट कहती है कि बिना तकनीकी स्वीकृति निर्माण नहीं हो सकता, बिना स्थल निरीक्षण भुगतान नहीं हो सकता, और बिना गुणवत्ता परीक्षण भवन हैंडओवर नहीं किया जा सकता। तो फिर सवाल उठता है कि तकनीकी स्वीकृति देने वाले इंजीनियरों ने क्या देखा? निर्माण के दौरान निरीक्षण करने वाले अधिकारी कहां थे? लोकार्पण से पहले भवन की गुणवत्ता जांच क्यों नहीं हुई? या फिर यह मान लिया जाए कि सब कुछ देखकर भी आंखें मूंद ली गईं, ताकि भुगतान की फाइलें तेजी से सरक सकें, लोकार्पण पट्टिका बनी शोपीस, दीवारें बनी सबूत सभागार में लगी लोकार्पण शिला आज भी पूरी शान से टंगी है, लेकिन उसी भवन की दीवारों में उभरी दरारें प्रशासनिक लापरवाही का पोस्टमार्टम कर रही हैं। यह दरारें बता रही हैं कि यह भवन ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि लापरवाही, मिलीभगत और उदासीनता से बना है। जनता का पैसा, अधिकारियों की चुप्पी सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या 25 लाख रुपये जनता की मेहनत की कमाई नहीं हैं? यदि हैं, तो फिर इस तरह की निर्माणात्मक धोखाधड़ी पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं? आज तक न कोई जांच के आदेश, न कोई दोष तय, न कोई जवाबदेही यह चुप्पी खुद में बहुत कुछ कह रही है, भविष्य में हादसे का खतरा, जिम्मेदार कौन? यदि समय रहते इस सभागार की संरचनात्मक जांच नहीं कराई गई, तो भविष्य में यह भवन कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों, और आम नागरिकों के लिए जानलेवा खतरा भी बन सकता है, उस स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी? ठेकेदार की? इंजीनियर की? या उस अधिकारी की, जिसने आंखें बंद कर फाइल आगे बढ़ा दी? जांच नहीं, अब कार्रवाई हो, अब यह मामला केवल सवालों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, आवश्यकता है कि स्वतंत्र एजेंसी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण और गुणवत्ता रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, दोषी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाए, जिम्मेदार अधिकारियों पर विभागीय और आपराधिक कार्रवाई हो। विकास नहीं, विकास के नाम पर मज़ाक जनपद पंचायत लखनादौन का यह सभागार आज विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि विकास के नाम पर किए जा रहे मज़ाक की मिसाल बन चुका है। यह भवन साफ कह रहा है अगर निगरानी नहीं, अगर ईमानदारी नहीं, तो 25 लाख क्या 250 लाख भी मिट्टी में मिल जाएंगे। अब देखना यह है कि शासन इस दरकते सच को गंभीरता से लेता है या फिर इसे भी अन्य मामलों की तरह फाइलों के मलबे में दफना दिया जाएगा।




